Priya Suvarṇadāsa
Priya Suvarṇadāsa
प्रिय सुवर्णदास — प्रिय, सुवर्ण, दास। प्रेम से, सोने की तरह, समर्पित।
Priya Suvarṇadāsa MahaMarga के अध्ययन और भारतीय रहस्यवाद की एक विद्यार्थी हैं। उनका काम उस जीवित धागे को ढूँढता है जो पहली सदी की Wayist शिक्षाओं से चलकर भक्ति आंदोलन तक, और वहाँ से आज तक पहुँचता है।
Bhakti काव्य — जनाबाई, मीराबाई, कबीर, अक्कमहादेवी — और MahaMarga की दार्शनिक परंपरा के बीच के संवाद में उनकी विशेष रुचि है। वे मानती हैं कि ये दो अलग धाराएँ नहीं हैं — एक ही नदी के दो किनारे हैं।
“जो धागा मारीया ने पहली सदी में पकड़ा था — वह जनाबाई की उँगलियों से, मीराबाई के होठों से होता हुआ, आज भी चल रहा है। हम उसी धागे पर चल रहे हैं।”