भारतीय परंपरा
मिर्च — और एक आदमी का स्वभाव
एक बात है जो MahaMarga की परंपरा में Thomas Didymus के बारे में सबसे पहले याद की जाती है।
वह यह नहीं कि उन्होंने काश्मीर में एक भव्य amphitheatre बनाया। न यह कि राजा Gondophares ने उन्हें अपना प्रधान वास्तुकार बनाया। न यह कि उनके बाद Siphor ने उस पूरी community की बागडोर सँभाली।
जो सबसे पहले याद किया जाता है — वह है Thomas की मिर्च।
एक धागा — जो हज़ार साल तक खिंचता रहा
भक्ति आंदोलन के बारे में इतिहास की किताबें कहती हैं — यह बारहवीं-तेरहवीं सदी में शुरू हुआ।
लेकिन MahaMarga की दृष्टि से — यह आंदोलन उस पहले बीज का फूल था, जो पहली सदी में बोया गया था।
काश्मीर में। एक Wayist Sangha में। उस समय जब Thomas Didymus — Iesous के शिष्य — राजा Gondophares के दरबार में बैठकर एक नई दुनिया का स्वप्न देख रहे थे। जब माता मारीया मगधालेने की शिक्षाएँ व्यापार-मार्गों पर फैल रही थीं — काश्मीर से जमशेदपुर तक, अरब से इथियोपिया तक।
यह लेख-श्रृंखला में दूसरा है। पहला लेख पढ़ें →
एक गलत नाम से शुरू होती है कहानी
ईसाई बाइबल में एक किताब है — “Gospel of John”।
यह नाम सबको पता है। लेकिन जो नाम कम लोग जानते हैं — वह यह है कि यह किताब मारीया ने लिखी थी।
उस मारीया ने — जो मगध से आई थी। जो Iesous के साथ काश्मीर से जेरूसलम तक गई। जिसने अपनी आँखों से वह सब देखा जो बाकी कोई न देख सका।
वह नाम जो इतिहास ने छुपा लिया
दुनिया उसे Magdalene के नाम से जानती है।
लेकिन यह नाम न गलील (Galilee) के किसी गाँव का है, न हिब्रू भाषा का। यह नाम है — मगधालेने — अर्थात, मगध की रहने वाली।
मगध। वही प्राचीन भारतीय साम्राज्य, जहाँ बुद्ध ने ज्ञान पाया था। जहाँ से मौर्य वंश ने पूरे उपमहाद्वीप को एक सूत्र में पिरोया था। वही भूमि, जहाँ एक छोटी-सी लड़की का जन्म हुआ — जिसका नाम था मारीया।
यह लेख-श्रृंखला में तीसरा है। पहला → | दूसरा →
युसमर्ग — जहाँ Iesous ने चाय बनाई थी
पहाड़ चढ़ते-चढ़ते एक बुज़ुर्ग औरत रुकी।
उसने चारों तरफ देखा। पहाड़, घाटी, एक छोटा-सा घर जिसकी चिमनी से धुआँ उठ रहा था। और कुछ — कुछ जाना-पहचाना।
“यहाँ मैं पहले आई हूँ,” उसने सोचा। “लेकिन कब?”
घर का दरवाज़ा खुला। एक बूढ़ी औरत, पीठ झुकी हुई, निकली।
दोनों ने एक-दूसरे को देखा।
“यह जगह क्या कहलाती है?” मारीया ने पूछा।